हर सुबह रवि अपने बेटे आरव को स्कूल बस में बैठाने जाता था।
बस ठीक आठ बजे आती थी।
उसमें बच्चे शोर मचाते रहते थे।
ड्राइवर की सीट पर हमेशा एक बूढ़ा आदमी बैठा दिखाई देता था।
लेकिन एक सोमवार को कुछ अजीब हुआ।
बस आई।
दरवाज़ा खुला।
बच्चे अंदर बैठे थे।
लेकिन ड्राइवर की सीट खाली थी।
रवि ने बस के अंदर झाँककर पूछा—
“ड्राइवर साहब कहाँ हैं?”
एक बच्चे ने धीरे से कहा—
“अंकल, आज तो बस खुद चलकर आई है।”
स्कूल से आया फोन
रवि ने आरव को बस में बैठने नहीं दिया।
वह उसे अपनी कार से स्कूल छोड़ आया।
दोपहर में स्कूल से फोन आया।
मैडम ने पूछा—
“आरव आज स्कूल आया है क्या?”
रवि हैरान रह गया।
उसने कहा—
“हाँ, मैंने उसे सुबह छोड़ा था।”
मैडम ने बताया कि आरव की क्लास में उसकी उपस्थिति दर्ज नहीं हुई थी।
रवि तुरंत स्कूल पहुँचा।
क्लास खाली थी।
लेकिन ब्लैकबोर्ड पर चॉक से लिखा था—
“आरव बस में बैठा है।”
पुरानी बस की तस्वीर
रवि ने स्कूल के गार्ड से बस के बारे में पूछा।
गार्ड ने बस का नंबर सुना तो उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
उसने बताया कि उसी नंबर की एक स्कूल बस कई साल पहले दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी।
उस दुर्घटना में ड्राइवर और कुछ बच्चों की मौत हो गई थी।
उसके बाद बस को कबाड़ में भेज दिया गया था।
रवि ने कहा—
“लेकिन वह बस आज सुबह मेरे सामने आई थी!”
गार्ड ने काँपती आवाज़ में जवाब दिया—
“साहब, वह बस हर साल उसी तारीख को लौटती है।”
बस फिर दिखाई दी
रवि अपने बेटे को ढूँढ़ने के लिए बाहर निकला।
सड़क के मोड़ पर वही पीली बस खड़ी थी।
उसके अंदर बच्चे चुपचाप बैठे थे।
खिड़की के पास आरव दिखाई दिया।
वह अपने पिता को देखकर हाथ हिला रहा था।
रवि बस की तरफ दौड़ा।
लेकिन बस धीरे-धीरे चलने लगी।
उसने चिल्लाकर कहा—
“आरव! नीचे उतरो!”
आरव ने शीशे पर हाथ रखा।
उसके होंठ हिले—
“पापा, दरवाज़ा नहीं खुल रहा!”
ड्राइवर की सीट
रवि बस के पीछे दौड़ता रहा।
अचानक बस एक सुनसान सड़क पर रुक गई।
दरवाज़ा खुला।
रवि अंदर चढ़ गया।
सभी सीटें खाली थीं।
न आरव।
न दूसरे बच्चे।
बस के आगे ड्राइवर की सीट पर वही बूढ़ा आदमी बैठा था।
उसने बिना पीछे देखे कहा—
“आपको इतनी देर से नहीं आना चाहिए था।”
रवि ने पूछा—
“मेरे बेटे को कहाँ ले गए?”
बूढ़े ने शीशे में उसकी तरफ देखा।
उसकी आँखें पूरी तरह सफेद थीं।
वह बोला—
“जिसे आप ढूँढ़ रहे हैं, वह तो पहले ही घर पहुँच चुका है।”
घर में इंतज़ार
रवि घबराकर घर लौटा।
दरवाज़ा खुला था।
अंदर आरव सोफे पर बैठा था।
उसकी माँ उसे गले लगाए रो रही थी।
रवि ने राहत की साँस ली।
उसने आरव से पूछा—
“बेटा, तुम घर कैसे पहुँचे?”
आरव ने मासूमियत से जवाब दिया—
“पापा, मैं तो सुबह से यहीं हूँ।”
रवि ने अपनी पत्नी की तरफ देखा।
उसने बताया कि आरव सुबह से घर पर ही था।
रवि को समझ नहीं आया कि उसने बस में किस बच्चे को देखा था।
अगली सुबह रवि को दरवाज़े के बाहर एक स्कूल बैग मिला।
उसमें एक पुरानी तस्वीर रखी थी।
तस्वीर में वही पीली बस थी।
ड्राइवर की सीट पर बूढ़ा आदमी बैठा था।
और पीछे की सीट पर रवि का चेहरा था।
तस्वीर के पीछे लिखा था—
“कल तुम्हारी बारी है।”
कुछ लोग ऐसी घटनाओं को real horror story in hindi की तरह पढ़ते हैं।
लेकिन इस बस का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि उसमें बैठे बच्चे कौन थे।
अगर आप horror story in hindi पसंद करते हैं, तो बिना ड्राइवर वाली इस बस का अंत आपको भी सोचने पर मजबूर करेगा।
क्योंकि कुछ unexpected stories में सबसे डरावनी चीज़ भूत नहीं होता…
बल्कि वह सच होता है, जो अगली सुबह दरवाज़े पर आपका इंतज़ार कर रहा होता है।
पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ:
Unexpected Stories.in

